कागजी दावों के ‘तालाब’ में डूबा अम्बिकापुर, दो दिन की बारिश ने उतारी नगर निगम की हेकड़ी, नाली साफ कर ढक्कन भूलने वाले हुक्मरानों की ‘अंधी’ सरकार कब जागेगी?
अम्बिकापुर। सड़कों पर तैरती गाड़ियां, दुकानों के मुहाने पर बजबजाती खुली नालियां, नरक बने गड्ढे और बंद कमरों में बैठकर ‘सब चंगा सी’ का अलाप जपते नगर निगम के सफेदपोश हुक्मरान। यही आज छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला मुख्यालय अम्बिकापुर की कड़वी हकीकत है। पिछले महज दो दिनों की मूसलाधार बारिश ने इस तथाकथित स्मार्ट सिस्टम की ऐसी पोल खोली है कि निगम प्रशासन के तगड़े दावों का तंबू पानी में बह गया है। हर साल की तरह इस बार भी कुछ ही घंटों की बारिश ने यह साबित कर दिया कि शहर की बदहाल सड़कें और जलभराव की समस्या निगम के लिए सिर्फ एक सालाना तमाशा है।
बनारस रोड, एमजी रोड सहित शहर के कई प्रमुख मार्ग जब तेज बारिश होती है तो पानी में लबालब डूबकर तालाब बन जाते है और सड़कें जानलेवा गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं। राहगीर और वाहन चालक अपनी जान हथेली पर लेकर इन रास्तों से गुजरते है, जहाँ हर कदम पर दुर्घटना का साया मंडरा रहा है। सबसे हास्यास्पद बात यह है कि निगम के अधिकारी दावा ठोक रहे हैं कि 1 मई से 15 सदस्यीय ‘स्पेशल टीम’ बनाकर शहर की छोटी-बड़ी नालियों को चमकाया जा रहा है। अगर यह कागजी सफाई और जल निकासी की योजनाएं वाकई जमीन पर उतरी होतीं, तो आज पहली ही बारिश में अम्बिकापुर का यह हाल न होता। सच तो यह है कि जब तक जनता के सिर पर आफत आकर नाचने नहीं लगती, तब तक इस कुंभकर्णी प्रशासन की नींद नहीं टूटती।
अब जब जनता त्राहि-त्राहि कर रही है, तब निगम आयुक्त डी.एन. कश्यप का सरकारी बयान सामने आता है कि ‘शहर के तीन प्रमुख स्थानों पर जलभराव की समस्या चिन्हित की गई है और एनएच (NH) के अधिकारियों के साथ चर्चा कर स्थायी व्यवस्था बनाई जा रही है।’ सवाल यह उठता है कि क्या निगम प्रशासन पूरा साल भांग खाकर सोता रहता है? मानसून से पहले जो काम पूरी प्लानिंग के साथ हो जाना चाहिए था, उसके लिए अब बारिश शुरू होने के बाद बैठकें और चर्चाएं की जा रही हैं।
इस प्रशासनिक सुस्ती और घोर लापरवाही का सबसे वीभत्स नजारा मंगलवार को गांधीनगर इलाके के साईं मंदिर रोड पर देखने को मिला। जब बारिश सिर पर आ गई, तो आनन-फानन में निगम के कर्मचारी जेसीबी और ट्रैक्टर लेकर नाली सफाई का ढोंग करने पहुंच गए। नालियों के भारी-भरकम ढक्कन उखाड़े गए, कीचड़ और मलबा निकाला गया, लेकिन काम खत्म होते ही हुक्मरान अपनी अक्ल और जिम्मेदारी दोनों वहीं छोड़कर रफूचक्कर हो गए।
आज आलम यह है कि दुकानों के ठीक सामने मौत के कुएं की तरह खुली नालियां प्रशासन के अंधेपन का मुंह चिढ़ा रही हैं। इन खुली नालियों से उठती असहनीय बदबू और गंदगी ने स्थानीय दुकानदारों का जीना मुहाल कर दिया है। ग्राहक उस दुकान की तरफ रुख भी नहीं करना चाहते जिसके सामने मौत का गड्ढा खोदा गया हो। लोग मजबूरन साफ-सुथरी जगहों की दुकानों में जा रहे हैं, जिससे इन व्यापारियों का धंधा पूरी तरह चौपट हो चुका है। गाड़ियों की पार्किंग तो दूर, पैदल चलने वालों के लिए भी यह सड़क किसी जानलेवा ट्रैक से कम नहीं है।
आखिर नगर निगम के ये खोखले दावे धरातल पर कब उतरेंगे? जनता टैक्स समय पर देती है ताकि उन्हें सहूलियत मिले, इसलिए नहीं कि निगम की सुस्ती उनके रोजगार को निगल जाए और उन्हें सड़कों पर लबालब पानी और गड्ढों के हवाले कर दे। कुर्सी पर बैठे हुक्मरानों को अपनी बंद आंखों पर बंधी पट्टी को खोलकर देखना होगा कि उनके दावों की हकीकत जमीन पर कितनी गंदी, बदबूदार और खतरनाक है।
