छत्तीसगढ़: प्रदेश के अलग-अलग जिलों में मानसून के आसार दिखने लगे हैं। ऐसे में अब किसान धान की रोपाई से पहले किए जाने वाले धान का थरहा तैयार कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के गांवों में रहने वाले किसान आज भी अपनी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।

आज हम आपको ऐसे ही एक गांव की परंपरा के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका नाम बुर्जुडीह है। यहां के लोग आज भी अपने पूर्वजों द्वारा शुरू की गई परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

दरअसल, छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के बगीचा ब्लॉक की ग्राम पंचायत छोरोडीह का आश्रित गांव बुर्जुडीह है, जहां सालों से चली आ रही परंपरा का आज भी पालन किया जा रहा है। इस गांव में धान की बोआई और रोपाई से पहले पूरे गांव के सियान (बुजुर्ग) गांव के सरना, यानी साल के पेड़ के पास एकत्रित होते हैं। इसके बाद गांव का बैगा किसानों की धान की फसल की अच्छी पैदावार की कामना करते हुए बनगड़ी पूजा करता है।

इसके अलावा, इस साल धान की रोपाई के लिए गांव के सभी वर्गों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए एक निश्चित दर निर्धारित की जाती है, ताकि सभी वर्ग के लोग आसानी से धान की रोपाई करा सकें। इतना ही नहीं, बैल, हल और हल चलाने वालों की भी दर निर्धारित की जाती है।
ऐसे ही प्रदेश के अलग-अलग गांवों में रहने वाले किसान अपने पूर्वजों की परंपराओं को आज भी सहेजकर रखे हुए हैं। इस पूजा की खास बात यह है कि गांव का बैगा खेत में वर्षा का पानी एकत्रित करता है और बनगड़ी पूजा के बाद धान की रोपाई की शुरुआत करता है। साथ ही मंत्रोच्चार कर इस वर्ष अच्छी फसल और भरपूर उत्पादन की कामना करता है। इन्हीं परंपराओं और किसानों की मेहनत के कारण छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा भी कहा जाता है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ देश में अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए है।
