एसईसीएल अमेरा कोल माइंस की बदहाली: अवैध वसूली और प्रशासनिक लापरवाही ने ठप किया कोयला ट्रांसपोर्ट
अंबिकापुर: लखनपुर स्थित दक्षिण पूर्व मध्य कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की अमेरा कोल माइंस इन दिनों भारी कुव्यवस्था, अवैध वसूली और लचर प्रशासनिक व्यवस्था का केंद्र बन गई है। कोल माइंस में पार्किंग के नाम पर हो रही अवैध उगाही और बदहाल सड़कों के कारण क्षेत्र में कोयला उत्पादन और ट्रांसपोर्टिंग का कार्य पूरी तरह से चरमरा गया है।



अवैध वसूली का खेल
माइंस में आने वाले प्रत्येक ट्रक से कोल माइंस के नाम पर 600 रुपये प्रति वाहन की अवैध वसूली खुलेआम की जा रही है, जिससे वाहन मालिक और ट्रांसपोर्टर बुरी तरह त्रस्त हैं।

उत्पादन और सप्लाई में भारी गिरावट
प्रतिदिन 4,000 टन कोयला सप्लाई करने का लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन बारिश, कीचड़ और खदान परिसर में पानी निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण वर्तमान में केवल 300 से 400 टन कोयला ही सप्लाई हो पा रहा है। इस भारी गिरावट के चलते डीओ (DO) धारकों को प्रतिदिन भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

ऑक्शन में हड़बड़ी और डीओ होल्डर्स की मार
कोल प्रबंधन द्वारा कोयले का ऑक्शन तो जल्दबाजी में कर दिया गया, लेकिन खदान पर बुनियादी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने की कोई सुध नहीं ली गई। प्रबंधन की इसी हड़बड़ी और लचर व्यवस्था के कारण कोयले का समय पर उठाव नहीं हो पा रहा है, जिसका सीधा और भारी नुकसान डीओ होल्डर्स को उठाना पड़ रहा है।
सड़क निर्माण में लेटलतीफी और बदहाल मार्ग
खदान तक पहुँचने वाली मुख्य सड़क का निर्माण कार्य बरसात शुरू होने से पहले ही पूरा किया जाना था, जिसे विभागीय लापरवाही के चलते समय पर पूरा नहीं किया गया। सड़क की स्थिति इतनी खराब है कि वाहन चालकों का चलना दूभर हो गया है।

4 किलोमीटर लंबी ट्रकों की कतारें
महज 6 महीने पहले ग्रामीणों के कड़े विरोध के बीच इस खदान का विस्तार किया गया था। आज स्थिति यह है कि प्रबंधन की अड़ियल और लचर कार्यशैली के कारण खदान के बाहर ट्रकों की 4 किलोमीटर से अधिक लंबी कतारें लगी हुई हैं।
प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
स्थानीय लोगों और वाहन चालकों का आरोप है कि अमेरा कोल माइंस प्रबंधन की उदासीनता के कारण स्थिति बद से बदतर हो गई है। एक ओर जहाँ बरसात के मौसम से निपटने के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किए गए, वहीं दूसरी ओर पार्किंग के नाम पर चल रहे अवैध वसूली के नेटवर्क ने ट्रांसपोर्टरों की कमर तोड़ दी है। यदि समय रहते जिला प्रशासन और SECL उच्च प्रबंधन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो यह संकट और अधिक गहरा सकता है।
