सरगुजा पुलिस पर ‘वसूली’ का काला दाग, बेजुबानों की सांसों का सौदा, हर बुधवार की रात ₹500 में बिकती खाकी
अंबिकापुर। कानून के रखवाले जब अपनी वर्दी की गरिमा को चंद रुपयों की भेंट चढ़ा दें, तो व्यवस्था खुद कटघरे में खड़ी नजर आती है। उत्तर प्रदेश की मंडियों से छत्तीसगढ़ के भिलाई की ओर जाने वाले पशु लदे वाहनों से जिस तरह सरगुजा संभाग में सरेआम वसूली का खेल चल रहा है, उसने पुलिसिया कार्यप्रणाली की बखिया उधेड़ कर रख दी है। विशेषकर सरगुजा जिला पुलिस की भूमिका इस पूरे गोरखधंधे में सबसे ज्यादा शर्मनाक और संदेहास्पद बन चुकी है। जिला मुख्यालय अम्बिकापुर में कानून-व्यवस्था का दंभ भरने वाली सरगुजा पुलिस की आंखों के सामने से मूक पशुओं को नरकीय यातनाएं देकर गुजारा जा रहा है, लेकिन कार्रवाई करने के बजाय खाकी केवल ₹500 के ‘टोकन मनी’ में अपना ईमान गिरवी रख रही है।

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act) और मोटर वाहन अधिनियम के तहत पशुओं के परिवहन के लिए स्पष्ट और कड़े नियम तय हैं। नियमानुसार, प्रत्येक मूक पशु के लिए वाहन में पर्याप्त जगह, वेंटिलेशन और स्वास्थ्य सुरक्षा का प्रबंध होना अनिवार्य है। लेकिन यहां उत्तर प्रदेश से आ रही पिकअप और ट्रकों में नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए लोहे के दोहरे-तिहरे खांचे (पार्टीशन) बनाए जाते हैं और एक-एक पिकअप में 65 से 70 बकरों को ठूंस-ठूंस कर भर दिया जाता है। इस अमानवीय और गैर-कानूनी तरीके से सांस लेने तक को तरसते बेजुबान जानवर सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करते हैं। नियमानुसार पुलिस को ऐसे वाहनों को तुरंत जब्त कर तस्करों और परिवहनकर्ताओं पर प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए। परंतु, सरगुजा पुलिस के लिए संविधान और कानून की किताबें महज औपचारिकता बनकर रह गई हैं; उनका असली सरोकार केवल प्रति गाड़ी ₹500 की वसूली तक सीमित हो चुका है।


इस अंतरराज्यीय रूट पर बलरामपुर के बसंतपुर व वाड्रफनगर और सूरजपुर के चंदौरा व प्रतापपुर से गाड़ियां निकलती जरूर हैं, लेकिन असली बेशर्मी सरगुजा जिले की सीमा में प्रवेश करते ही दिखती है। जिला मुख्यालय की नाक के नीचे मौजूद गांधीनगर थाना, कोतवाली थाना और मणिपुर चौकी क्षेत्र से ये गाड़ियां धड़ल्ले से गुजरती हैं। जब अम्बिकापुर के जागरूक मीडियाकर्मियों ने बकरा परिवहन करने वालों को रोककर सवाल किए, तो जो सच सामने आया उसने सरगुजा पुलिस के इकबाल का जनाजा निकाल दिया। परिवहनकर्ताओं ने कैमरे के सामने न केवल बेहिचक स्वीकार किया कि वे हर थाने में ₹500 देकर आगे बढ़ते हैं, बल्कि उन पुलिसकर्मियों के नाम और मोबाइल नंबर तक उजागर कर दिए जो हर बुधवार की रात सड़क पर खड़े होकर ‘एंट्री’ के नाम पर यह चिंदीचोरी करते हैं।


परिवहनकर्ता भले ही दावा करें कि उनकी खरीद वैध मंडियों से है, लेकिन जिस बर्बर और अवैध ढंग से वे पशुओं को ले जा रहे हैं, वह सीधे तौर पर अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सरगुजा के आला अधिकारियों को अपने ही मातहतों की इस खुली उगाही की भनक नहीं है, या फिर इस ₹500 वाली ‘पांसिंग वसूली’ की मलाई ऊपर तक पहुंच रही है? जिन थानों पर शहर की सुरक्षा और अपराध रोकने की जिम्मेदारी है, वे महज पांच सौ रुपये के लिए क्रूरता के इस काले कारोबार के भागीदार बन बैठे हैं। सड़क पर गश्त के नाम पर खड़ी पुलिस का यह रवैया न केवल वर्दी को कलंकित कर रहा है, बल्कि यह भी साबित कर रहा है कि सरगुजा में कानून का नहीं, बल्कि ₹500 की खुली छूट का राज चल रहा है।
